Paramhans Yog (भारतीय योग संस्कृति सुरक्षा एवं मानव कल्याण ट्रस्ट) was founded by Yogiraj Yogeshwar Giri and revered saintly associates, with the divine guidance of the Guru Parampara, in 2000. It was established as a response to the growing global yearning for authentic Yoga and Vedic wisdom, fuelled by the success of free spiritual camps and rural outreach initiatives. The Trust provides the necessary infrastructure, organisational framework, and humanitarian programs to advance the benefits of classical Yoga, Ayurveda, and meditation beyond boundaries — serving seekers from all walks of life.
Rooted in the Guru-Shishya tradition, our mission is to preserve the unbroken essence of Sanatan Dharma while making Yogic sciences accessible for inner transformation, mental wellbeing, and universal harmony. Through ashrams, free satsangs, and charitable initiatives, we continue to ignite the flame of self-realisation.
🔥 Akhand Dhuna
श्री योग योगेश्वर सिद्ध महादेव मंदिर अखंड धुनें की स्थापना कुम्भमाह अप्रैल २०१६ में हिमालय नागा साधु परमपूज्य श्री रामगिरी जी महाराज के कर-कमलों द्वारा हुई। आज परमपूज्य योगिराज योगेश्वरगिरी जी महाराज (सिद्धयोगी) पिछले दस वर्षों से इस दिव्यस्थान पर साधनारत हैं।
🕉 Yagya-Havan
यह पवन स्थली पूजा ओर साधना केंद्र के साथ साथ योग शिक्षा का भी बहुत बड़ा केंद्र है, सैकड़ों योग साधक प्रतिदिन यहां धुनें ओर मंदिर की सेवा के साथ-साथ पूज्य गुरुदेव के सानिध्य में योग शिक्षा और आध्यात्मिक शिक्षा का प्रसाद ग्रहण करने देश विदेश से आते हैं।
🧘 Dhyana
अरावली के सुंदर हरे भरे पहाड़ों के बीच और माही नदी के विशाल जल स्त्रोत के निकट स्थित यह मंदिर अनेक वनस्पतियों से घिरा हुआ है जो यहां की आध्यात्मिक शांति को प्राकृतिक विभीषणों से सुसज्जित कर देती हैं। मंदिर के ठीक पास प्राचीन बावड़ी है जो कि अपने आप में ही आध्यात्मिक शक्तियों का केंद्र है साथ ही धुनि के आसपास के सुंदर पेड़ पौधों का मुख्य जल का स्त्रोत भी है।
🙏 Seva
साल के हर पर्व पर पूरा गुरु परिवार ओर भक्तगण यहां एक साथ एक आस्था में जुड़कर बहुत धूमधाम से इन त्यौहारों को मनाते हैं। शिवरात्रि पर आदियोगी भगवान शिव की साधना, होली पर योग के रंग, गुरुपूर्णिमा पर गुरु भक्ति, जन्माष्टमी पर कृष्ण लीला, नवरात्रों में माता के नौ रूपों की शक्ति या दीवाली पर भगवान राम का नाम, सभी साधक पूरे हर्ष ओर उल्लास के साथ हर त्यौहार का आनंद और गुरुकृपा का लाभ उठाते हैं।
गृहस्थ सन्यास — जिन-जिन चीजों से मानव का कल्याण होता है, गौ की सुरक्षा करना, प्रकृति की जो धरोहर है, प्रकृति से जो हमें उपहार में मिली है, ऐसी धरोहर जो हमारे जीवन को बदल सकती है, आने वाली पीढ़ी को बदल सकती है, उन्हें संभालना — यह हमारी ट्रस्ट का एक माध्यम, एक उद्देश्य है।
आज की जो जीवन शैली है, उसमें जो बच्चा जब युवा अवस्था में आता है, तब तक अपने वीर्य का नाश कर चुका होता है। उसे ऐसा माहौल मिल रहा है, ऐसा भोजन मिल रहा है। वह जिस वातावरण में, जिस तरीके से रह रहा है, उसे ब्रह्मचर्य की महत्ता का कुछ पता ही नहीं है।
हमारा योग का उद्देश्य है कि ब्रह्मचर्य — जो पिलर है, स्तंभ है — मजबूत हो। आने वाली पीढ़ी इसकी महत्ता समझे। गृहस्थ में पूजा-पाठ करते ही पत्नी को डर हो जाता है, माँ को डर हो जाता है, बच्चों को डर हो जाता है। लोग डरते हैं कि कहीं यह सन्यासी न हो जाएँ।
गुरुओं से हमने सीखा: जो ब्रह्मचर्य काल अच्छे से चला, उसका गृहस्थ भी अच्छा होगा, उसे बाहर जाने की जरूरत नहीं। अभी वह समय नहीं है कि आप जंगल में चले जाएँ। यह तो परमात्मा या सद्गुरु का आदेश हो, तब समझ में आता है कि आप तपस्या कर रहे हो।
तो हमारा सूत्र बना — गृहस्थ सन्यास। हमने सभी शिष्यों को समझाया: आप योग करिए, योग के माध्यम से लोगों में सन्यास के प्रति जो डर है, वह हटाइए। गृहस्थ में रहकर भी पूजा-पाठ, ध्यान-साधना, सन्यासियों की सेवा करते हुए चलिए, जिससे गृहस्थ धर्म सन्यास में बदल जाए।
संतों के संग से गृहस्थ और भी सात्विक हो जाता है, वह गलत रास्ते पर नहीं जाता। हमारा उद्देश्य साफ है: आप गृहस्थ रहिए, परमात्मा की आराधना करिए, संतों और गुरुओं का साथ पकड़िए, उनकी सेवा करिए। विवाह से पहले ब्रह्मचर्य व्रत धारण करिए, जिससे शरीर पुष्ट और मजबूत हो।
कहीं न कहीं हमारे गृहस्थ से सन्यास, ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ — सब चले गए हैं। अब हमें शिक्षा कौन दे? सही-गलत का मार्ग कौन बताएगा? भारतीय योग संस्कृति सुरक्षा मानव कल्याण ट्रस्ट और गुरु महाराज ने समझाया: "गृहस्थ में दशरथ की तरह जियो, जनक की तरह जियो।"
गुरु महाराज ने कहा: गृहस्थ थोड़ा समय परिवार को देता है, इसलिए उसके पास साधु से कम समय होता है, मगर वह सन्यासी की सेवा करके यह पूर्ति कर सकता है। दशरथ ने दस इंद्रियों को वश में करके गृहस्थ में जीया — भगवान श्रीराम उनके घर अवतरित हुए। यही हमारा सूत्र है: गृहस्थ सन्यास।